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वन पर्व
अध्याय २८६
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा सहस्रांशुः सहसान्तरधीय़त |  १७   क
ततः सूर्याय़ जप्यान्ते कर्णः स्वप्नं न्यवेदय़त् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति