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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यः समेतास्तु तव पुत्रस्य भारत |  १४   क
एकादश हता युद्धे ताः प्रभो पाण्डुसृञ्जय़ैः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति