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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
भवान्हि नो वधोपाय़ं व्रवीतु स्वय़मात्मनः |  ५९   क
भवन्तं समरे राजन्विषहेम कथं वय़म् ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति