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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
भूमौ विवेष्टमानं तं रुधिरेण समुक्षितम् |  ४   क
महागजमिवारण्ये व्याधेन विनिपातितम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति