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कर्ण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा तु कर्णं भुवि निष्टनन्तं; हतं रथात्साय़केनावभिन्नम् |  २९   क
महानिलेनाग्निमिवापविद्धं; यज्ञावसाने शय़ने निशान्ते ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति