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भीष्म पर्व
अध्याय ९९
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सञ्जय़ उवाच
व्यमृद्नात्समरे राजंस्तुरगांश्च नरान्रणे |  ३२   क
एवं ते वहुधा राजन्प्रमृद्नन्तः परस्परम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति