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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्मै तदहं सर्वमुक्तवान्ग्रहणं तदा |  ४३   क
द्वैपाय़नप्रसादाच्च जीवतो मोक्षमाहवे ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति