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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् |  ४४   क
भ्रातॄंश्च सर्वसैन्यानि पर्यपृच्छत मां ततः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति