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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
स दीर्घमिव निःश्वस्य विप्रेक्ष्य च पुनः पुनः |  ४७   क
अंसे मां पाणिना स्पृष्ट्वा पुत्रस्ते पर्यभाषत ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति