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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
ते हताः प्रत्यपद्यन्त वसुधां विगतासवः |  ५   क
त्वरिता लोकवीरेण प्रहताः सव्यसाचिना ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति