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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
सुहृद्भिस्तादृशैर्हीनः पुत्रैर्भ्रातृभिरेव च |  ५०   क
पाण्डवैश्च हृते राज्ये को नु जीवति मादृशः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति