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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्निः प्रनष्टो भगवान्कारणं च न विद्महे |  १४   क
सर्वलोकक्षय़ो मा भूत्सम्पादय़तु नोऽनलम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति