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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा तु तद्राजन्निशम्य वचनं मम |  ५८   क
तं ह्रदं विपुलं प्रेक्ष्य करुणं पर्यदेवय़त् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति