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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
ततस्ता योषितो राजन्क्रन्दन्त्यो वै मुहुर्मुहुः |  ६५   क
कुरर्य इव शव्देन नादय़न्त्यो महीतलम् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति