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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रकुपितो राजा तमक्षेणाहनद्भृशम् |  ४४   क
मुखे युधिष्ठिरं कोपान्नैवमित्येव भर्त्सय़न् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति