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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
एतमर्थं महावाहुरुभय़ोः स न्यवेदय़त् |  ८०   क
तस्य प्रीतोऽभवद्राजा नित्यं करुणवेदिता |  ८०   ख
परिष्वज्य महावाहुर्वैश्यापुत्रं व्यसर्जय़त् ||  ८०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति