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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
ततः स रथमास्थाय़ द्रुतमश्वानचोदय़त् |  ८१   क
असम्भावितवांश्चापि राजदारान्पुरं प्रति ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति