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शान्ति पर्व
अध्याय १३४
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भीष्म उवाच
न धनं यज्ञशीलानां हार्यं देवस्वमेव तत् |  २   क
दस्यूनां निष्क्रिय़ाणां च क्षत्रिय़ो हर्तुमर्हति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति