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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
अहं तु तावत्पश्यामि कर्म यद्वर्तते कृतम् |  १४   क
गुणय़ुक्तं प्रकाशं च पापेनानुपसंहितम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति