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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
सञ्चिन्त्य मनसा राजन्विदित्वा शक्तिमात्मनः |  १८   क
करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति