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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
सतोय़ेऽन्यत्तु यत्तोय़ं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते |  २०   क
वृद्धे वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति