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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
राज्ञा जेतव्याः साय़ुधाश्चोन्नताश्च; सम्यक्कर्तव्यं पालनं च प्रजानाम् |  २२   क
अग्निश्चेय़ो वहुभिश्चापि यज्ञै; रन्ते मध्ये वा वनमाश्रित्य स्थेय़म् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति