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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
आय़ुर्नसुलभं लव्ध्वा नावकर्षेद्विशां पते |  ३   क
उत्कर्षार्थं प्रय़तते नरः पुण्येन कर्मणा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति