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शान्ति पर्व
अध्याय २८०
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पराशर उवाच
वर्णेभ्योऽपि परिभ्रष्टः स वै संमानमर्हति |  ४   क
न तु यः सत्क्रिय़ां प्राप्य राजसं कर्म सेवते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति