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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
अद्य तद्दिवसं चेति हुत्वा दीप्तं हुताशनम् |  १०   क
युगमात्रोदिते सूर्ये कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रिय़ाः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति