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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः सर्वान्द्विजान्वृद्धाञ्श्वश्रूं श्वशुरमेव च |  ११   क
अभिवाद्यानुपूर्व्येण प्राञ्जलिर्निय़ता स्थिता ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति