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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
सर्वेष्वपि च योधेषु चिन्तय़ञ्शिनिपुङ्गव |  ४२   क
त्वत्तः सुहृत्तमं कञ्चिन्नाभिजानामि सात्यके ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति