वन पर्व  अध्याय २८०

मार्कण्डेय़ उवाच

गणय़न्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते |  २   क
तद्वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति