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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
साभिगम्याव्रवीच्छ्वश्रूं श्वशुरं च महाव्रता |  २३   क
अय़ं गच्छति मे भर्ता फलाहारो महावनम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति