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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छेय़मभ्यनुज्ञातुमार्यया श्वशुरेण च |  २४   क
अनेन सह निर्गन्तुं न हि मे विरहः क्षमः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति