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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव |  २५   क
न निवार्यो निवार्यः स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति