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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
उभाभ्यामभ्यनुज्ञाता सा जगाम यशस्विनी |  २९   क
सह भर्त्रा हसन्तीव हृदय़ेन विदूय़ता ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति