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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति सञ्चिन्त्य भामिनी |  ३   क
व्रतं त्रिरात्रमुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताभवत् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति