वन पर्व  अध्याय २८०

मार्कण्डेय़ उवाच

नदीः पुण्यवहाश्चैव पुष्पितांश्च नगोत्तमान् |  ३१   क
सत्यवानाह पश्येति सावित्रीं मधुराक्षरम् ||  ३१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति