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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं श्रुत्वा निय़मं दुःखं वध्वा दुःखान्वितो नृपः |  ४   क
उत्थाय़ वाक्यं सावित्रीमव्रवीत्परिसान्त्वय़न् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति