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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
स्वाध्याय़ेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा |  १०   क
पितृभ्यः श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति