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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
गतः शुक्रत्वमुशना देवदेवप्रसादनात् |  १४   क
देवीं स्तुत्वा तु गगने मोदते तेजसा वृतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति