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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
एते महर्षय़ः स्तुत्वा विष्णुमृग्भिः समाहिताः |  १७   क
लेभिरे तपसा सिद्धिं प्रसादात्तस्य धीमतः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति