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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
अनर्हाश्चार्हतां प्राप्ताः सन्तः स्तुत्वा तमेव ह |  १८   क
न तु वृद्धिमिहान्विच्छेत्कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति