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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
गौरवेण परित्यक्तं निःस्नेहं परिवर्जय़ेत् |  २   क
सोदर्यं भ्रातरमपि किमुतान्यं पृथग्जनम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति