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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
न्याय़ागतं धनं वर्णैर्न्याय़ेनैव विवर्धितम् |  ४   क
संरक्ष्यं यत्नमास्थाय़ धर्मार्थमिति निश्चय़ः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति