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शान्ति पर्व
अध्याय २८१
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पराशर उवाच
न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमर्जय़ेत् |  ५   क
शक्तितः सर्वकार्याणि कुर्यान्नर्द्धिमनुस्मरेत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति