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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
सावित्री तत उत्थाय़ केशान्संय़म्य भामिनी |  १००   क
पतिमुत्थापय़ामास वाहुभ्यां परिगृह्य वै ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति