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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
कृत्वा कठिनभारं सा वृक्षशाखावलम्विनम् |  १०३   क
गृहीत्वा परशुं भर्तुः सकाशं पुनरागमत् ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति