वन पर्व  अध्याय २८१

मार्कण्डेय़ उवाच

वामे स्कन्धे तु वामोरूर्भर्तुर्वाहुं निवेश्य सा |  १०४   क
दक्षिणेन परिष्वज्य जगाम मृदुगामिनी ||  १०४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति