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वन पर्व
अध्याय २८१
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सत्यवानु उवाच
पलाशषण्डे चैतस्मिन्पन्था व्यावर्तते द्विधा |  १०७   क
तस्योत्तरेण यः पन्थास्तेन गच्छ त्वरस्व च |  १०७   ख
स्वस्थोऽस्मि वलवानस्मि दिदृक्षुः पितरावुभौ ||  १०७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति