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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा पितृराजस्तां भगवान्स्वं चिकीर्षितम् |  १४   क
यथावत्सर्वमाख्यातुं तत्प्रिय़ार्थं प्रचक्रमे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति