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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अय़ं हि धर्मसंय़ुक्तो रूपवान्गुणसागरः |  १५   क
नार्हो मत्पुरुषैर्नेतुमतोऽस्मि स्वय़मागतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति