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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम् |  १७   क
निर्विचेष्टं शरीरं तद्वभूवाप्रिय़दर्शनम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति