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वन पर्व
अध्याय २८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
यमस्तु तं तथा वद्ध्वा प्रय़ातो दक्षिणामुखः |  १८   क
सावित्री चापि दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत |  १८   ख
निय़मव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति